इंसानी मन समंदर की तरह है, कभी शांत, तो कभी लहरों से भरा। लेकिन क्या हो अगर ये लहरें अचानक सुनामी बन जाएं और अगले ही पल सब कुछ एकदम सुन्न पड़ जाए? अगर कोई व्यक्ति अभी खिलखिलाकर हंस रहा है और बिना किसी ठोस वजह के थोड़ी ही देर में फूट-फूट कर रोने लगे, तो इसे महज ‘मूड स्विंग्स’ कहकर टालना भारी पड़ सकता है।
डॉक्टर्स के मुताबिक, भावनाओं का यह खतरनाक ‘रोलर-कोस्टर’ बाइपोलर डिसऑर्डर (Bipolar Disorder) का संकेत हो सकता है। यह कोई पागलपन नहीं, बल्कि एक दिमागी स्थिति है जिसे सही समय पर समझना जरूरी है।
क्या हैं इसके वॉर्निंग साइन्स?
बाइपोलर डिसऑर्डर में इंसान दो चरम स्थितियों (Extremes) के बीच झूलता रहता है:
- मेनिया (Mania): अत्यधिक उत्साह का दौर
जरूरत से ज्यादा ऊर्जा: व्यक्ति को लगता है कि वह सुपरमैन है। वह बहुत तेज बोलता है और बड़े-बड़े वादे करता है।
नींद की कमी: दो-तीन घंटे की नींद के बाद भी उसे थकान महसूस नहीं होती।
फिजूलखर्ची: बिना सोचे-समझे लाखों रुपये लुटा देना या रिस्की फैसले लेना।

- डिप्रेशन (Depression): गहरा सन्नाटा
अकारण रोना: छोटी सी बात पर या बिना बात के भी रोना आना और मन का भारी रहना।
लाचारी का अहसास: खुद को बेकार समझना और उन कामों में भी मन न लगना जो पहले पसंद थे।
अकेले रहने की इच्छा: दुनिया से कट जाना और हर वक्त सुस्ती महसूस करना।
डॉक्टर क्यों कहते हैं इसे ‘गंभीर’?
बाइपोलर डिसऑर्डर में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इंसान को खुद पता नहीं चलता कि उसका व्यवहार असामान्य है। वह अपनी ‘मेनिया’ वाली स्थिति को अपनी असल ताकत समझने लगता है। लेकिन जब ‘लो फेज’ (डिप्रेशन) आता है, तो वह इतना गहरा होता है कि इंसान को अपनी जिंदगी बोझ लगने लगती है।
इसका इलाज कैसे संभव है?
अच्छी खबर यह है कि बाइपोलर डिसऑर्डर का इलाज मुमकिन है और मरीज एक सामान्य, सफल जिंदगी जी सकता है।
मूड स्टेबलाइजर्स (Mood Stabilizers): डॉक्टर कुछ ऐसी दवाइयां देते हैं जो दिमाग के रसायनों को संतुलित करती हैं, ताकि भावनाओं का उतार-चढ़ाव कंट्रोल में रहे।
थेरेपी (Psychotherapy): ‘टॉक थेरेपी’ के जरिए मरीज को अपने ट्रिगर्स (वो बातें जिनसे मूड बिगड़ता है) को पहचानना सिखाया जाता है।
लाइफस्टाइल में बदलाव: सही समय पर सोना, नशों से दूरी और तनाव मुक्त माहौल रिकवरी की रफ्तार बढ़ा देते हैं।
एक जरूरी बात
अगर आपके आसपास कोई ऐसा है जिसके व्यवहार में ऐसे अचानक बदलाव दिख रहे हैं, तो उन्हें ‘अजीब’ समझने के बजाय किसी मनोचिकित्सक (Psychiatrist) से मिलवाएं। आपका एक छोटा सा कदम किसी की बिखरती जिंदगी बचा सकता है।
0 Comments