Papmochani Ekadashi 2026, हिंदू धर्म में एकादशी के व्रतों का अपना ही एक अलग स्थान है, लेकिन ‘पापमोचनी एकादशी’ को लेकर भक्तों में एक विशेष श्रद्धा देखी जाती है। जैसा कि इसके नाम से ही झलकता है—’पाप’ को ‘मोचने’ यानी नष्ट करने वाली एकादशी। मान्यताओं के अनुसार, अगर कोई व्यक्ति जाने-अनजाने में हुई अपनी गलतियों का प्रायश्चित करना चाहता है, तो यह व्रत उसके लिए एक वरदान की तरह है।

साल 2026 में पापमोचनी एकादशी कब है, पूजा का सही समय क्या है और इसकी पौराणिक कथा क्या है, आइए विस्तार से और अपनी सरल भाषा में समझते हैं:
पापमोचनी एकादशी 2026: तिथि और शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार, चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को पापमोचनी एकादशी के रूप में मनाया जाता है। साल 2026 में यह व्रत 14 मार्च, शनिवार को रखा जाएगा।
- एकादशी तिथि का प्रारंभ: 13 मार्च 2026 को रात 10:40 बजे से।
- एकादशी तिथि का समापन: 14 मार्च 2026 को रात 09:20 बजे तक।
- व्रत पारण (खोलने) का शुभ समय: 15 मार्च 2026 की सुबह 06:20 से 08:45 के बीच।

Papmochani Ekadashi कथा: मेधावी ऋषि और मंजुघोषा की कहानी
इस व्रत के पीछे एक बहुत ही दिलचस्प और प्रेरणादायक कहानी है, जो हमें सिखाती है कि भक्ति की शक्ति से किसी भी गलती का सुधार संभव है।
प्राचीन काल में ‘च्यवन ऋषि’ के पुत्र मेधावी ऋषि चैत्ररथ वन में कठिन तपस्या कर रहे थे। उनकी तपस्या इतनी प्रभावशाली थी कि इंद्रदेव को अपना सिंहासन डोलता महसूस हुआ। तपस्या भंग करने के लिए उन्होंने ‘मंजुघोषा’ नाम की एक बेहद खूबसूरत अप्सरा को भेजा। मंजुघोषा ने अपने नृत्य और रूप-जाल से मेधावी ऋषि को मोहित कर लिया। ऋषि अपनी तपस्या भूल गए और कई वर्षों तक उसी मोह-माया में खोए रहे।
जब वर्षों बाद ऋषि को अपनी भूल का अहसास हुआ और उन्हें लगा कि उनकी तपस्या खंडित हो चुकी है, तो उन्हें खुद पर बहुत ग्लानि (पछतावा) हुई। क्रोध में आकर उन्होंने मंजुघोषा को ‘पिशाचिनी’ होने का श्राप दे दिया। अप्सरा ने रोते हुए ऋषि के पैर पकड़ लिए और क्षमा मांगी।
तब मेधावी ऋषि ने शांत होकर उसे मुक्ति का मार्ग बताया। उन्होंने कहा कि “चैत्र कृष्ण पक्ष की पापमोचनी एकादशी का व्रत विधि-विधान से करो, इससे तुम्हारे सारे पाप मिट जाएंगे और तुम फिर से अपने असली रूप में आ जाओगी।” ऋषि ने खुद भी अपने पिता च्यवन ऋषि के कहने पर इस व्रत को पूरी श्रद्धा से किया। परिणाम स्वरूप, ऋषि का तेज वापस लौट आया और मंजुघोषा भी श्राप से मुक्त होकर स्वर्ग वापस चली गई।
पूजा विधि: कैसे करें भगवान विष्णु को प्रसन्न?
- संयम और नियम: एकादशी से एक दिन पहले (दशमी की रात) सात्विक भोजन करें और ब्रह्मचर्य का पालन करें।
- स्नान और संकल्प: 14 मार्च की सुबह जल्दी उठकर पवित्र स्नान करें और हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें।
- विष्णु पूजन: भगवान विष्णु के ‘चतुर्भुज’ रूप की पूजा करें। उन्हें पीले वस्त्र, पीले फूल और विशेष रूप से तुलसी दल अर्पित करें।
- मंत्र और आरती: ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का मानसिक जाप करते रहें। शाम को घी का दीपक जलाकर आरती करें और ऊपर दी गई व्रत कथा जरूर सुनें।
- दान का महत्व: अगले दिन यानी द्वादशी को किसी जरूरतमंद को अन्न या वस्त्र का दान देकर ही व्रत खोलें।
यह कथा हमें सिखाती है कि इंसान चाहे कितना भी बड़ा ज्ञानी क्यों न हो, मोह-माया किसी को भी भटका सकती है। लेकिन हिंदू धर्म की खूबसूरती यही है कि यहाँ ‘प्रायश्चित’ का रास्ता हमेशा खुला रहता है। अगर आपसे भी कोई भूल हुई है और मन भारी रहता है, तो यह एकादशी एक नई शुरुआत करने का सबसे अच्छा मौका है।
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